Computer

कंप्यूटर शब्द अंग्रेजी के   कुल आठ शब्दों को मिलकर बनाया गया है. जो इसके मतलब को और भी अधिक Comprehensive बना देता है| कंप्यूटर शब्द के आठ शब्द की जानकारी 

C-COMMONLY.

O-OPERATED.

M-MACHINE.

P-PARTICULARLY.

U-USED For.

T-TECHNICAL.

E-EDUCATION.

R-RESEARCH.

कम्प्यूटर का परिचय (Introduction to Computers)

मानव के लिए गणना (Calculation) करना शुरु से ही कठिन रहा है मनुष्य बिना किसी मशीन (Machine) के एक सीमित स्तर तक ही गणना (Calculation) कर सकता है ज्यादा बडी कैलकुलेशन करने के लिए मनुष्य को मशीन पर ही निर्भर रहना पड़ता है इसी जरुरत को पूरा करने के लिए मनुष्य ने कम्प्यूटर का निर्माण किया | इसे अंक गणितीय, तार्किक क्रियाओं व अन्य विभिन्न प्रकार की गणनाओं को सटीकता से पूर्ण करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से निर्देशित किया जा सकता है। इस निर्देशन को ही कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग कहते है और संगणक कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा की मदद से उपयोगकर्ता के निर्देशो को समझता है।

अबेकस (Abacus) – 3000 वर्ष पूर्व

अबेकस का निर्माण (Construction) लगभग 3000 वर्ष पूर्व चीन के वैज्ञानिको ने किया था। एक आयताकार फ्रेम (Rectangular frame) में लोहे की छड़ो  में लकड़ी की गोलियां लगी रहती थी जिनको ऊपर नीचे करके गणना (calculation) की जाती थी। यानी यह बिना बिजली के चलने वाला पहला कंप्यूटर (first computer) था|  वास्तव में यह काम करने के लिए आपके हाथों पर ही निर्भर था।

Antikythera system – 2000 वर्ष पूर्व

Antikythera वास्तव  में एक खगोलीय कैलकुलेटर था जिसका प्रयोग प्राचीन यूनान में सूर्य और चंद्र ग्रहों को ट्रैक करने के लिए किया जाता था, एंटीकाईथेरा प्रणाली (Antikythera system) लगभग 2000 साल पुराना है, वैज्ञानिको को यह प्रणाली  1901 में एंटीकाइथेरा द्वीप पर पूरी तरह से नष्‍ट हो चुके जहाज से पुरानी अवस्था में प्राप्त‍ हुआ था, इसी कारण इसका नाम एंटीकाईथेरा सिस्‍टम पड़ा तभी से वैज्ञानिक इसे डिकोड करने में लगे थे और लंबे अध्ययन के बाद अब इस कंप्यूटर को डिकोड कर लिया गया है। यह मशीन ग्रहों के साथ ही आकाश में सूरज  और चंद्रमा की स्थिति दिखाने का काम करती है। एंटीकाईथेरा प्रणाली ने आधुनिक युग का पहला ज्ञात एनलॉग कंप्यूटर होने का श्रेय प्राप्त कर लिया, यूनानी ने एंटीकाईथेरा सिस्टम को खगोलीय और गणितीय आकड़ो का सही अनुमान लगाने के लिए विकसित किया गया था|

प्रथम यांत्रिक कैलकुलेटर –  जर्मन गणितज्ञ विल्हेम शीकार्ड ने 1623 ई. मे प्रथम यांत्रिक कैलकुलेटर का विकास किया। यह कैलकुलेटर जोड़ने, घटाने, गुणा व भाग में सक्षम था।

पास्‍कलाइन (Pascaline) – सन् 1642

अबेकस के बाद निर्माण हुआ पास्‍कलाइन का। इसे गणित के विशेषज्ञ ब्लेज पास्कल ने सन् 1642 में बनाया यह अबेकस से अधिक गति से गणना करता था। ये पहला मैकेनिकल कैलकुलेटर (Mechanical calculator) था। इसे मशीन को जोड यंत्र  (Adding Machine) कहा जाता था, Blase Pascal की इस Adding Machine को Pascaline भी कहते हैं

डिफरेन्स इंजन (Difference Engine) – सन् 1822

डिफरेन्स इंजन सर चार्ल्स बैबेज (Sir Charles Babbage) द्वारा बनाया एेसा यंत्र था जो सटीक तरीके (Exact methods) से गणनायें कर सकता था,  इसका आविष्कार सन 1822 में किया गया था, इसमें प्रोग्राम स्टोरेज ( Program storage) के लिए के पंच कार्ड का इस्‍तेमाल किया जाता था। यह भाप से चलता था, इसके आधार ही आज के  कंप्यूटर बनाये जा रहे हैं इसलिए चार्ल्स बैवेज को कंप्यूटर का जनक कहते है ।

ZUSE Z3 – सन् 1941

महान वैज्ञानिक “कोनार्ड जुसे” नें “Zuse-Z3” नामक एक अदभुत यंत्र का आविष्कार किया जो कि द्वि-आधारी अंकगणित (Binary Arithmetic) एवं चल बिन्दु अंकगणित की गणनाओ (Floating point Arithmetic) पर आधारित सर्वप्रथम Electronic Computer था।

अनिएक (ENIAC) – सन् 1946

अमेरिका की एक Military Research room ने “ENIAC” मशीन जिसका अर्थ  (Electronic Numerical Integrator And Computer) का निर्माण किया। “ENIAC”  दशमलव अंकगणितीय प्रणाली (Decimal Arithmetic system ) पर कार्य करता था, बाद में  “ENIAC” सर्वप्रथम कंप्यूटर के रूप में प्रसिद्ध हुई जो कि आगे चलकर आधुनिक कंप्यूटर (Modern computer) के रूप में विकसित (Developed)  हुई | इनिएक की प्रोग्रामिंग अलग-अलग कार्य करने के लिए की जा सकती थी।

मैनचेस्टर स्‍माल स्‍केल मशीन (SSEM) – सन् 1948

(SSEM) पहला ऐसा कंंम्‍यूटर था जो किसी भी प्राेग्राम को वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) में सुरक्षित रख सकता था, इसका निक नेम Baby रखा गया था, इसे बनाया था फ्रेडरिक विलियम्स और टॉम किलबर्न ने |

हिंदी में कम्प्यूटर जनरेशन का इतिहास (History of Computer Generation in Hindi)

कम्प्यूटर का शुरूआती दौर ऐसा ना था, यह शुरूआत में बहुत बड़े, भारी और मेहंगे  हुआ करते थे। समय के हिसाब से इसकी तकनीक में बहुत से बदलाव हुए, इन बदलावों से कम्प्यूटरो की नई पीढ़ियों (Generation) का जन्म होने लगा, हर पीढ़ी के बाद कम्प्यूटर के आकार-प्रकार, कार्यप्रणाली और कार्य-क्षमता में सुधार होता गया, तब जाकर आज के समय का कम्प्यूटर बन पाया|

पहली पीढ़ी के कंप्यूटर – First Generation computer (1942-1955)

इस पीढी के कंप्यूटर में वैक्यूम ट्यूब (Vacuum Tube) का प्रयोग किया जाता था, जिसकी वजह से इनका आकार बहुत बडा होता था और बिजली खपत भी बहुत अधिक होती थी। यह ट्यूब बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते थे। इन कंम्यूटरों में ऑपरेंटिग सिस्टम (Operating system) नहीं होता था, इसमें चलाने वाले प्रोग्रामों को पंच कार्ड (panch card) में स्टोर करके रखा जाता था। इसमें डाटा स्टोर करने की क्षमता बहुत सीमित होती थी। इन कंप्यूटरों में मशीनी भाषा (Machine language) का प्रयोग किया जाता था।

दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर – First generation computer (1956-1963)

दूसरी पीढ़ी के कंप्यूटर में वैक्यूम ट्यूब की जगह ट्रांजिस्टर (Transistor) ने ले ली। ट्रांजिस्टर वैक्यूम ट्यूब से काफी बेहतर था। इसके साथ दूसरी पीढी के कंप्‍यूटरों में मशीनी भाषा (Machine language) के बजाय असेम्बली भाषा (Assembly language) का उपयोग किया जाने लगा, हालांं‍कि अभी भी डाटा स्‍टोर करने के लियेे पंचकार्ड का इस्‍तेेमाल किया जाता था

तीसरी पीढ़ी के कंप्यूटर – Third generation computer (1964-1975)

यहाॅ तक अाते अाते ट्रांजिस्टर (Transistor) की जगह इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuit) यानि IC ने ले ली और इस प्रकार कंप्यूटर का अाकार बहुत छोटा हो गया, इन कंम्यूटरों की गति माइक्रो सेकंड से नेनो सेकंड तक की थी जो स्केल इंटीग्रेटेड सर्किट के द्वारा संभव हो सका। यह कंम्यूटर छोटे अौर सस्ते बनने लगे और साथ ही उपयोग में भी अासान होते थे। इस पीढी में उच्च स्तरीय भाषा पास्कल (Pascal) और बेसिक (Basic) का विकास हुआ। लेकिन अभी भी बदलाव हो रहा था।

चौथी पीढ़ी के कंप्यूटर – Fourth generation computers (1967-1989)

चिप (Chip) तथा माइक्रोप्रोसेसर (microprocessor) चौथी पीढी के कंप्यूटरों में आने लगे थे, इससे कंप्यूटरों का आकार कम हो गया और क्षमता बढ गयी। चुम्बकीय डिस्क (magnetic disk) की जगह अर्धचालक मैमोरी (Semiconductor memory) ने ले ली साथ ही उच्च गति वाले नेटवर्क (High speed networks) का विकास हुआ जिन्हें आप लेन (LAN) और वेन (VAN) के नाम से जानते हैं। ऑपरेटिंग के रूप में यूजर्स (Users) का परिचय पहली बार MS DOS से हुआ, साथ ही कुछ समय बाद माइक्रोसॉफ्ट विंडोज (Microsoft Windows) भी कंप्यूटरों में आने लगी। जिसकी वजह से मल्टीमीडिया (multi media) का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। इसी समय C भाषा (Language) का विकास हुआ, जिससे प्रोग्रामिंग (Programming) करना सरल हुआ।

पांचवीं पीढ़ी के कंप्यूटर – Fifth generation computers (1989 से अब तक)

Ultra Large-Scale Integration (ULSI) यूएलएसआई, ऑप्टीकल डिस्क (Optical Disk) जैसी चीजों का प्रयोग इस पीढी में किया जाने लगा, कम से कम जगह में अधिक डाटा स्टोर (Data store) किया जाने लगा। जिससे पोर्टेबल पीसी, डेस्कटॉप पीसी, टेबलेट आदि ने इस क्षेत्र में क्रांति ला दी। इंटरनेट, ईमेल, WWW का विकास हुआ। आपका परिचय विडोंज के नये रूपों से हुआ, जिसमें विडोंज XP को भुलाया नहीं जा सकता है। विकास अभी भी जारी है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) पर जोर दिया जा रहा है। उदाहरण के लिये विडोंज कोर्टाना को आप देख ही रहे हैं।  

Computer क्या है ?

कम्प्यूटर गणितीय और अगणितीय क्रियाओं को करने वाला इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (Electronic device) है । यह आँकड़ों को इनपुट के तौर पर लेता है उन्हें प्रोसेस (Process) करता है और आउटपुट के तौर पर अर्थपूर्ण नतीजे प्रदान करता है । हम अपरिपक्व तथ्यों को आँकड़े के रूप में इकट्ठे करते हैं और ये आँकड़े कम्प्यूटर में डाले जाते हैं । कम्प्यूटर इन आँकड़ों को प्रोसेस करके हमें सूचनायें (Information) प्रदान करता है ।

अक्सर लोग सोचते हैं कि कम्प्यूटर एक सर्वशक्तिमान सुपरमैन की तरह है परन्तु ऐसा है नहीं । यह केवल एक स्वचालित इलेक्ट्रॉनिक मशीन (Automatic electronic machine) है जो तीव्र गति से कार्य करता है और गलती नहीं करता है । इसकी क्षमता सीमित है । यह अंग्रेजी शब्द कम्प्यूट से बना है जिसका अर्थ गणना करना है । हिन्दी में इसे संगणक कहते हैं । इसका उपयोग बहुत सारे सूचनाओं को प्रोसेस करने तथा इकट्टा करने के लिए होता है ।

कम्प्यूटर एक यंत्र है व इसे सॉफ्टवेयर (Software) या प्रोग्राम (Program) के अनुसार किसी परिणाम के लिए प्रोसेस करता है । कम्प्यूटर को कृत्रिम बुद्धि (Artificial intelligence) की संज्ञा दी गई है । इसकी स्मरण शक्ति मनुष्य की तुलना में उच्च होती है ।

कम्प्युटर सिस्टम के घटक (Components of Computer System):

किसी भी कम्प्युटर सिस्टम को मुख्यत: तीन भागो मे बांटा जा सकता है | 

  1. हार्डवेयर (Hardware)
  2. सॉफ्टवेयर (Software)
  3. डाटा (Data)

कम्प्यूटर की विशेषताएँ (Features of computer) :

  • यह तीव्र गति से कार्य करता है अर्थात समय की बचत होती है ।
  • यह त्रुटिरहित कार्य करता है ।
  • यह स्थायी तथा विशाल भंडारण क्षमता की सुविधा देता है ।
  • यह पूर्व निर्धारित निर्देशों के अनुसार तीव्र निर्णय लेने में सक्षम है ।

कम्प्यूटर के उपयोग (Use of computer) :

  • रक्षा में
  • व्यापार में
  • संचार में
  • मनोरंजन में
  • शिक्षा के क्षेत्र में
  • वैज्ञानिक अनुसंधान (Scientific research) में
  • रेलवे तथा वायु यान आरक्षण (Air carriage reservation) में
  • बैंक में

कम्प्यूटर के कार्य (Computer work):

  1. डेटा संकलन (Data Collection)
  2. डेटा संचयन (Data Storage)
  3. डेटा संसाधन (Data Processing)
  4. डेटा निर्गमन (Data Output)

पर्सनल कम्प्यूटर (Personal computer) क्या है ?

पर्सनल कम्प्यूटर व्यक्तिगत उपयोग के लिए छोटा, अपेक्षाकृत कम ख़र्चीला डिज़ाइन किया गया कम्प्यूटर है । यह माइक्रो प्रोसेसर प्रौद्योगिकी (Microprocessor technology) पर आधारित है । व्यापार में इसका उपयोग शब्द संसाधन (Resources), लेखांकन (Accounting), डेस्क टॉप प्रकाशन (Publishing), स्प्रेडशीट तथा डेटाबेस प्रबंधन (Database Management) आदि के लिए होता है । घर में पर्सनल कम्प्यूटर का उपयोग मनोरंजन के लिए, ई-मेल देखने तथा छोटे-छोटे दस्तावेज़ (Document) तैयार करने के लिए होता है ।

पर्सनल कम्प्यूटर के निम्नलिखित मुख्य भाग है :

  • सी पी यू (CPU)
  • हार्ड डिस्क (Hard Disk)
  • सीडी ड्राइव (CD-Drive)
  • फ्लॉपी ड्राइव(Floppy Drive)
  • मॉनिटर (Monitor)
  • माउस (Mouse)
  • की-बोर्ड (Keyboard)
  • यू पी एस (UPS)
  • स्पीकर (Speaker)

कंप्यूटर सिस्टम के घटक (Components of Computer System):

सॉफ्टवेयर (Software) क्या है ?

सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामिंग भाषा (Programming language) द्वारा लिखे गये निर्देशों की श्रृंखला (Series of instructions) है, जिसके अनुसार दिए गये डेटा का प्रोसेस होता है । बिना सॉफ्टवेयर के कम्प्यूटर कोई भी कार्य नहीं कर सकता है । इसका प्राथमिक उद्देश्य डाटा को सूचना में परिवर्तित करना है । सॉफ्टवेयर के निर्देशों के अनुसार ही हार्डवेयर भी कार्य करता है । इसे प्रोग्राम भी कहते हैं । हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के बीच संचार स्थापित करने को इंटरफेस (Interface) कहते हैं ।

सभी सॉफ्टवेयर लाइसेंस के माध्यम से संरक्षित (Protected) तथा प्रतिवेधित (Surpressed) रहते हैं । सॉफ्टवेयर लाइसेंस सॉफ्टवेयर के निर्माता तथा उपयोगकर्त्ता के बीच कानूनी एग्रीमेंट है, जिसके अन्तगर्त एक से अधिक कम्प्यूटर पर सॉफ्टवेयर को इंस्टॉल (Installs) करना, कोड में किसी तरह का रूपांतरण और सॉफ्टवेयर में किसी तरह का बदलाव करना निषेध है । यह सॉफ्टवेयर के उपयोग को प्रतिबंधित (Restricted) करता है ।

कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर विभिन्न तरह के होते हैं । सामान्यतः इसे तीन वर्गों में वर्गीकृत (Classified) किया जाता है :

  • सिस्टम सॉफ्टवेयर (System Software)

    यह कम्प्यूटर हार्ड वेयर को नियंत्रित (Control) करता है कि अनु प्रयोग सॉफ्टवेयर अच्छी तरह से चल सके । जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating system), डिवाइस ड्राइवर (Device driver), विंडोज सिस्टम (Windows system) आदि । 

  • अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर (Application Software)

    यह यूज़र को एक या एक से अधिक कोई विशेष कार्य पूरा करने की अनुमति देता है । उच्च स्तरीय की कम्प्यूटर भाषाओं (Computer languages) का उपयोग कर अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर बनाये जाते हैं । सॉफ्टवेयर प्रोग्राम अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा जाता है, अतः यूज़र आसानी से कम्प्यूटर का उपयोग कर सकता है । जैसे – वर्ड प्रोसेसर (Word Processor), औद्योगिक स्वचालन (Industrial automation), व्यापार सॉफ्टवेयर और चिकित्सा सॉफ्टवेयर आदि | 

  • प्रोग्रामिंग सॉफ्टवेयर (Programming Software)

    यह आमतौर पर कम्प्यूटर प्रोग्राम लिखने में एक प्रोग्रामर की सहायता करने के लिए उपकरण (Equipment) प्रदान करता है, जैसे – पाठ संपादक (Text Editor), कम्पाइलर (Compiler), डिबगर (Debugger), इन्टरप्रेटर (Interpreter) आदि ।

एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर (Application software) क्या है ?

एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर (Application Software) एक ऐसा सॉफ्टवेयर जिसे विशेष उपयोगिताओं (Special utilities) के लिए बनाया गया है । एप्लिकेशन प्रोग्राम सामान्य उद्देश्यों के लिए बनाये जाते हैं जैसे की उपज का लेखा-जोखा (Yielding account), सामान्य बिल बुक और खाता-बही (Ledger) बनाना आदि । ये पैकेज बैंकों, अस्पतालों, बीमा कंपनियों, पब्लिकेशनों (Publications) आदि के लिए बनाये जाते हैं ।

एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है :

  1. विशेष उद्देश्यीय एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर (Customized Application Software) :

    ये वे प्रोग्राम है जो कि उपभोक्ता की आवश्यकताओं के अनुरूप विशेष तौर पर बनाये जाते हैं । इन सॉफ्टवेयर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये उपभोक्ता की सारी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं । इस प्रकार के सॉफ्टवेयरों की मुख्य हानि यह है कि ये सामान्य उद्देश्यीय सॉफ्टवेयरों की तुलना महँगा होता है ।

  2. सामान्य उद्दश्यीय एप्लिकेशन सॉफ्टवेयर (General Purpose Application Software) :

    ये वे प्रोग्राम हैं जो कि लोगों के सामान्य आवश्यक कार्यों को करने के लिए बनाये जाते हैं । प्रत्येक प्रोग्राम इस ढंग से लिखा जाता है कि वह बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं पर लागू हो । इस सॉफ्टवेयर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह सस्ता होता है । लेकिन इसकी एक बड़ी हानि यह है कि ये उपभोक्ताओं की सभी जरूरतों को पूरा नहीं करता ।

UPS क्या है ?

UPS का पूरा नाम Uninterruptible Power Supply है । यह बैटरी से संचालित (Operated) उपकरण है जिसके द्वारा कम्प्यूटर में स्थिर बिजली आपूर्ति (Supply) बनी रहती है । यह कंप्यूटर को तब पॉवर देता है जब अचानक मुख्य सप्लाई से पॉवर कट जाती है ।

UPS के अन्दर एक बैटरी लगी होती है जो की 20-40 मिनट तक पॉवर दे सकती है । इससे हमें यह लाभ होता है कि जब मुख्य सप्लाई से पॉवर आनी बन्द हो जाती है उस समय हम कंप्यूटर को ढंग से बन्द कर सकते हैं ।

CPU क्या है ?

CPU का पूरा नाम Central Processing Unit है । इसे प्रोसेसर (Processor) या माइक्रोप्रोसेसर (Micro Processor) भी कहते हैं । यह  कंप्यूटर से जुड़े विभिन्न उपकरणों को नियंत्रित करता है । यह कम्प्यूटर द्वारा प्राप्त सूचनाओं (Information) का विश्लेषण (Analysis) करता है । यह एक इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोचिप (MIcrochip) है जो डेटा को सूचना में बदलते हुए प्रोसेस करता है । इसे कम्प्यूटर का ब्रेन (Brain) कहा जाता है । यह कम्प्यूटर सिस्टम के सारे कार्यों को नियंत्रित करता है तथा यह इनपुट (Input) को आउटपुट (Output) में रूपान्तरित (Convert) करता है । यह इनपुट तथा आउटपुट यूनिट (Unit) से मिलकर पूरा कम्प्यूटर सिस्टम (System)बनाता है ।

इसके निम्नलिखित भाग है :-

  • अर्थमेटीक लॉजिक यूनिट (Arithmetic Logic Unit ) :-

इसका उपयोग अंक गणितीय (Numeral Mathematical) तथा तार्किक गणना (Logical calculation) में होता है । अंकगणितीय गणना के अन्तगर्त तुलनात्मक गणना (Comparative calculation) के अन्तगर्त जोड़, घटाव, गुणा और भाग इत्यादि तथा तार्किक गणना के अन्तगर्त तुलनात्मक गणना जैसे (<, > या =), हाँ या ना इत्यादि आते हैं ।

  • कंट्रोल यूनिट (Control Unit) :-

यह कम्प्यूटर के सारे कार्यों को नियंत्रित करता है तथा कम्प्यूटर के सारे भागों जैसे इनपुट, आउटपुट डिवाइसेज, प्रोसेसर इत्यादि के सारे गतिविधियों के बीच तालमेल बैठाता है ।

  • मेमोरी यूनिट (Memory Unit) :-

यह डेटा तथा निर्देशों के संग्रह करने में प्रयुक्त होता है । इसे मुख्यतः दो वर्गों प्राइमरी तथा सेकेंडरी मेमोरी में विभाजित करते हैं । जब कम्प्यूटर कार्यशील रहता है, अर्थात वर्तमान में उपयोग हो रहे डेटा तथा निर्देशों का संग्रह प्राइमरी मेमोरी (Primary memory) में होता है । सेकेंडरी मेमोरी (Secondary memory) का उपयोग बाद में उपयोग होने वाले डेटा तथा निर्देशों को संग्रहित करने में होता है ।

ऑपरेटिंग सिस्टम क्या है ?

ऑपरेटिंग सिस्टम (Operating System)एक ऐसा प्रोग्राम है जो कम्प्यूटर के हार्डवेयर (Hardware) और उपभोक्ता (Consumer) के बीच माध्यम का काम करता है । ऑपरेटिंग सिस्टम का प्राथमिक लक्ष्य कम्प्यूटर सिस्टम को प्रयोग के लिए सुविधाजनक बनाना है और इसका द्वितीय लक्ष्य कम्प्यूटर हार्डवेयर को सुचारू (Smooth) रूप से चलाना है ।

ऑपरेटिंग सिस्टम प्रोग्रामों का एक सेट है जो कम्प्यूटर के संसाधनों को प्रबंधित करने के लिए डिज़ाइन (Design) किया गया है और जिसमें कम्प्यूटर को शुरू करना, प्रोग्रामों को मैनेज करना, मेमोरी को मैनेज करना और इनपुट तथा आउटपुट डिवाइसों के बीच के कार्यों का समन्वय (Co-ordination) करना शामिल है ।

ऑपरेटिंग सिस्टम के प्रकार :

  • एकाकी उपभोक्ता ऑपरेटिंग सिस्टम (Single User Operating System) :

एकाकी उपभोक्ता ऑपरेटिंग सिस्टम एक ऐसा ऑपरेटिंग सिस्टम है जो केवल एक उपभोक्ता को एक ही समय में कार्य करने की अनुमति (Permission) देता है । MS DOS सबसे अधिक प्रचलित एकाकी उपभोक्ता ऑपरेटिंग सिस्टम है ।

  • मल्टी-यूजर ऑपरेटिंग सिस्टम (Multi-User Operating System) :

बड़ा कम्प्यूटर अधिक कार्यकुशलता (Work efficiency) से उपयोग किया जा सकता है, यदि एक ही समय पर बहुत से उपभोक्ता इस पर काम करें । ऐसा लोकल एरिया नेटवर्क (Local area network) के तहत टाइम शेयरिंग मोड़ (Time Sharing Mode) में ही सम्भव है । इन बहु-उपभोक्तओं के साथ ऑपरेटिंग सिस्टम प्रत्येक उपभोक्ता को एक निश्चित समय बाँटता है और इस बात पर भी कड़ी मेहनत करता है कि आउटपुट उपकरणों को जाने वाले नतीजे आपस में मिल न जाए । युनिक्स (Unix), विंडोज 98 आदि कुछ बहु-उपभोक्ता ऑपरेटिंग सिस्टम हैं ।

मेमोरी (Memory) क्या है ?

मेमोरी कम्प्यूटर का बुनियादी घटक (Basic Component) है । यह कम्प्यूटर का आंतरिक भंडारण (Internal storage) क्षेत्र है । केन्द्रीय प्रोसेसिंग इकाई (CPU) को प्रोसेस करने के लिए इनपुट डाटा एवं निर्देश चाहिए, जो की मेमोरी में संग्रहित (Store) रहता है । मेमोरी में ही संग्रहित तथा निर्देश का प्रोसेस होता है, तथा आउटपुट प्राप्त होता है । अतः मेमोरी कम्प्यूटर का एक आवश्यक अंग है ।

मेमोरी बहुत सारे सेल में बँटे होते है जिन्हें लोकेशन (Location) कहते हैं । हर लोकेशन का एक अलग लेबल (Label)होता है जिसे एड्रेस (Address) कहते हैं ।

मेमोरी दो प्रकार के होते हैं :

  1. प्राथमिक मेमोरी (Primary Memory) :

    प्राथमिक मेमोरी को अक्सर मुख्य मेमोरी (Main Memory) भी कहते हैं, जो कम्प्यूटर के अन्दर रहता है तथा इसके डेटा और निर्देश का CPU द्वारा तीव्र (Quick) तथा प्रत्यक्ष (Direct) उपयोग होता है ।

  2. सहायक मेमोरी (Secondary Memory) :

    इसे सहायक तथा समर्थन (Backing) स्टोरेज मेमोरी भी कहते हैं । चँकि मुख्य मेमोरी अस्थाई (Temporary) तथा सीमित क्षमता वाले होते हैं इसलिए द्वितीयक मेमोरी को बड़ी मात्रा में स्थायी (Permana डेटा मेमोरी के रूप में इस्तेमाल करते हैं । ज्यादातर इसका उपयोग डेटा बैकअप (Back up) के लिए किया जाता है । CPU को वर्तमान में जिस डेटा की आवश्यकता नहीं होती है उसे द्वितीयक मेमोरी (Secondary memory) में संग्रह किया जाता है ।

इन्टरनेट (Internet) क्या है ?

इन्टरनेट का मतलब उच्चस्तरीय कम्प्यूटर (High level computer) का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे से जुड़ाव है । ये जुड़ाव नेटवर्क केबल्स (Network cables), टेलीफोन केबलों (Telephone cables), माइक्रोवेव डिश, सैटेलाइट और अन्य प्रकार के आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (Electronic devices) के द्वारा सम्भव किया जाता है । इन्टरनेट विश्व के विभिन्न नेटवर्कों से सम्बन्ध रखने वालों हजारों कम्प्यूटर का एक जुड़ाव है । इससे नेटवर्किंग (Networking) के माध्यम से विश्व में किसी भी जगह से विभिन्न प्रकार की सूचनाओं में भागीदारी की जा सकती है ।

नेटवर्क (Network) क्या है ?

नेटवर्क आपस में एक दूसरे से जुड़े कंप्यूटरों का समूह (Group) है जो एक दूसरे से संचार (Communications) स्थापित करने तथा सूचनाओं (Informations), संसाधनों (Resources) को साझा इस्तेमाल करने में सक्षम (Capable) होते हैं । किसी भी नेटवर्क को स्थापित करने के लिए प्रेषक (Sender), प्राप्तकर्ता (Recipient), माध्यम तथा प्रोटोकॉल की आवश्यकता होती है । कम्प्यूटर के साधनों में भागीदारी करने के उद्देश्य से बहुत-से कंप्यूटरों का आपस में जुड़ना कम्प्यूटर नेटवर्किंग कहलाता है । कम्प्यूटर नेटवर्किंग की मदद से उपभोक्ता उपकरणों, प्रोग्रामों, संदेशों और सूचनाओं को एक ही जगह पर रहकर उनके साथ भागीदारी कर सकते हैं ।

नेटवर्क (Network) स्थापित करने के लिए मुख्य उपकरण (Main equipment) निम्नलिखित है :

  • रिपीटर्स (Repeaters)
  • हब (Hub)
  • स्विच (Switches)
  • राउटर्स (Routers)
  • गेटवे (Gateways)

नेटवर्क के निम्नलिखित प्रकार हैं (Types of network) :

  • लोकल एरिया नेटवर्क (Local Area Network-LAN) :-

यह एक कम्प्यूटर नेटवर्क है, जिसके अन्दर छोटे भौगोलिक क्षेत्र जैसे – घर, ऑफिस, भवनों का एक छोटा समूह या हवाई अड्डा आदि में कम्प्यूटर नेटवर्क है । वर्तमान लैन ईथरनेट (LAN Ethernet) तकनीक पर आधारित है । इस नेटवर्क का आकर छोटा, लेकिन डेटा संचारण (Data transmission) की गति तीव्र होती है ।

  • वाइड एरिया नेटवर्क (Wide Area Network-WAN) :-

इस नेटवर्क में कम्प्यूटर आपस में लीज्ड लाइन (Leased line) या स्विचड सर्किट (Swithed circuit) के द्वारा जुड़े रहते हैं । यह नेटवर्क व्यापक भौगोलिक क्षेत्र देश में फैला नेटवर्क का जाल है । इंटरनेट (Internet) इसका अच्छा उदाहरण है । भारत में CMC द्वारा विकसित इंडोनेट WAN का उदाहरण है । बैंकों द्वारा प्रदत्त ATM सुविधा वाइड एरिया नेटवर्क का उदाहरण है ।

  • मेट्रोपोलिटन एरिया नेटवर्क (Metropolitan Area Network-MAN) :-

MAN दो या दो से अधिक लोकल एरिया नेटवर्क को जोड़ता है । यह शहर की सीमाओं के भीतर स्थित कंप्यूटरों का नेटवर्क है । राउटर्स (Routers), स्विच (Switches) और हब्स (Hubs) मिलकर एक MAN का निर्माण करते हैं ।

नेटवर्क टोपोलॉजी (Network Topology) क्या है ?

नेटवर्क टोपोलॉजी विभिन्न नोड्स (Nodes) या टर्मिनल (Terminal) को आपस में जोड़ने का तरीका है । यह विभिन्न नोड्स के बीच भौतिक संरचना (Physical structure) को दर्शाता है । नेटवर्क संरचना का अर्थ है कि नेटवर्क तारों की तर्कपूर्ण व्यवस्था (Logical system) । अन्य शब्दों में, कम्प्यूटरों का आपस में जुड़ने का ढंग ही नेटवर्क टोपोलॉजी कहलाता है ।

नेटवर्क टोपोलॉजी निम्नलिखित प्रकार के होते हैं (Types of network topology) :

  • मेस टोपोलॉजी (Mesh Topology) :

यह नेटवर्क उच्च ट्रैफिक (HIgh Traffic) स्थिति में मार्ग (Routes) को ध्यान में रखकर उपयोग किया जाता है । इसमें किसी भी स्त्रोत (Source) से कई मार्गों से सन्देश भेजा जा सकता है । पूर्णतः इन्टरकनेक्टेड (Inter-connected) मेस नेटवर्क खर्चीला है, क्योंकि इसमें ज्यादा केबल (Cable) तथा नोड में इंटेलिजेंस की आवश्यकता होती है । इस नेटवर्क में उच्च सुरक्षा अनुप्रयोग (High security application) में डाटा प्रेषित (Send) किया जाता है ।

  • स्टार टोपोलॉजी (Star Topology) :

इस नेटवर्क में एक केन्द्रीय नोड (Central node) होता है जो इंटेलिजेंस से युक्त (Contain) होता है । बाकि नोड्स इससे जुड़े रहते हैं । इस केन्द्रीय नोड को हब कहते हैं । कोई एक केबल में कोई कठिनाई आने पर एक ही नोड विफल होता है परन्तु अगर हब में कोई कठिनाई आती है तो सारा नेटवर्क विफल होता है ।

  • रिंग टोपोलॉजी (Ring Topology) :

इस नेटवर्क में सभी नोड्स में समान रूप से इंटेलिजेंस होता है । डेटा का प्रवाह हमेशा एक ही दिशा में होता है परन्तु किसी भी एक केबल या नोड में कठिनाई आने पर दूसरे से संचार संभव है ।

  • बस टोपोलॉजी (Bus Topology) :

इस नेटवर्क में सभी नोड्स एक ही केवल में जुड़े रहते हैं । कोई भी नोड किसी दूसरे नोड को डेटा प्रेषित करना चाहता है तो उसे देखना होता है की बस में कोई डेटा प्रवाहित तो नहीं हो रहा है । बस खाली रहने पर नोड डेटा प्रेषित कर सकता है । इसमें कम केबल की आवश्यकता होती है तथा नया नोड जोड़ना आसान होता है । परन्तु प्रमुख ट्रांसमिशन लाइन (Transmission line) में कठिनाई आने पर सारा नेटवर्क विफल हो जाता है ।

वेब ब्राऊजर (Web Browser) क्या है ?

वेब एक विशाल पुस्तक की तरह है तथा वेब ब्राऊजर एक सॉफ्टवेयर है जो कम्प्यूटर को इंटरनेट से जोड़ता है । यह बहुत ही महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर है । ब्राऊजर वर्ड वाइड वेब (World Wide web) पर साइट (Site) देखने का एक सामान्य साधन है । इन सॉफ्टवेयर का उपयोग कर हम लोग इंटरनेट से जुड़ने में सक्षम (Capable) होते हैं, तथा वेब से अपने पसंद की जानकारियों को प्राप्त कर सकते हैं । यह अनेक कार्यों को जैसे की ई-मेल (e mail), खबरें(News), इंटरनेट से बात करना, वार्तालाप (Conversation), मल्टीमीडिया (Multi media) आदि को नियंत्रित करता है ।

ब्राऊजर भी एक वेब ग्राहक (Web client) माना जाता है क्योंकि क्लाइन्ट मॉडल में यह क्लाइन्ट प्रोग्राम की तरह कार्य करता है । ब्राउजर वेब सर्वर (Web server)  से सम्पर्क बनाता है और सूचनाओं के लिए निवेदन करता है ।

वेब ब्राऊजर का उपयोग कर हम लोग किसी विशेष पेज या लोकेशन पर उसके पता टाइप कर जा सकते हैं, इस पता को यूआरएल (URL) कहते हैं।

कुछ प्रमुख वेब ब्राऊजर निम्नलिखित है :-

  • नेटस्केप नेविगेटर (Netscape Navigator)
  • माइक्रोसॉफ्ट इंटरनेट एक्सपलोरर (Microsoft Internet Explorer)
  • मौजिला फायरफॉक्स (Mozilla Firefox)
  • NCSA मॉजैक (NCSA Mosaic)
  • ओपेरा (Opera)
  • सफारी (Safari)
  • क्रोम (Chrome)

वर्ल्ड वाइड वेब (World wide web) क्या है ?

वर्ल्ड वाइड वेब और इंटरनेट दोनों दो चीजे हैं परन्तु दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं । वर्ल्ड वाइड वेब जानकारी युक्त पेजों का विशाल संग्रह (Large collection of pages) है जो एक दूसरे से जुड़ा है । जिसे वेब पेज (Web page) कहते हैं । वेब पेज HTML भाषा में लिखा होता है जो कंप्यूटर में प्रयुक्त एक भाषा है । वेब पेज को जो रोचक बनाता है वह है हाइपरलिंक (Hyperlink), जिसे अक्सर लिंक (Link) कहा जाता है।

हर लिंक किसी दूसरे पेज को इंगित करता है और जब हम इस पर क्लिक (Click) करते हैं तो हमारा ब्राउज़र लिंक से जुड़े पेज को उपलब्ध कराता है। अतः वर्ल्ड वाइड वेब एक विशाल सूचनाओं का डेटाबेस (Database) है तथा हर सूचना एक दूसरी सुचना से जुड़ा है।

URL (Uniform Resource Locator) क्या है ?

URL (Uniform Resource Locator), यह इंटरनेट पर किसी भी संसाधन (resources) का पता देने के लिए स्टैन्डर्ड तरीका (Standard way) है। यह इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं का पता बताता है तथा उस सूचना के प्रोटोकॉल एवं डोमेन (Domain) नाम को भी दर्शाता है।

जैसे – http://www.google.com में http हाइपर टेक्स्ट ट्रांसफर प्रोटोकॉल (Hyper text transfer protocol) है । जिसका उपयोग कर वर्ल्ड वाइड वेब पर yahoo.com नामक वेबसाइट पर जा सकते हैं।

TCP/IP क्या है ?

टी सी पी (TCP) का अर्थ है ट्रान्समिशन कन्ट्रोल प्रोटोकॉल (Transmission Control Protocol) और आई पी (IP)का अर्थ  इन्टरनेट प्रोटोकॉल (Internet Protocol)।

यह नियमों का एक समूह है, जो इंटरनेट कैसे कार्य करता है यह निर्णय करता है । यह दो कम्प्यूटर के बीच सूचना स्थान्तरण और संचार को संभव करता है । इनका प्रयोग डाटा को सुरक्षित ढंग से भेजने के लिए किया जाता है । TCP की भूमिका डाटा को छोटे-छोटे भागों में बाँटने की होती है और IP इन पैकिटों पर लक्ष्य स्थल का पता अंकित करता है ।

IP एड्रेस क्या है ?

IP Address चार संख्याओं का एक समूह है जो डॉट (.) से अलग किया जाता है । जिसका एक भाग नेटवर्क का पता (Network Adress) तथा दूसरा भाग नोड पता (Node Address) है । नेटवर्क में जुड़े प्रत्येक नोड का IP Adress खास तथा अलग-अलग होता है ।

उदाहरण – IP एड्रेस 202.54.18.128 में 202.54 नेटवर्क एड्रेस है तथा 18.128 नोड एड्रेस है ।

डोमेन नाम क्या है ?

डोमेन नाम (Domain Name)एक विशेष नाम है जो इंटरनेट साइट की पहचान बताता है । किसी इंटरनेट वेबसाइट (Website) का URL के अंत में डॉट (.) के बाद के नाम को डोमेन कहते हैं । जैसे – https://sarkarinaukripdf.com में .com डोमेन नेम है । यह किसी संस्था या देश को इंगित करता है ।

कुछ महत्वपूर्ण डोमेन नेम निम्नलिखित है :

  • .acro – एवीएशन
  • .gov – सरकारी संस्था
  • .in – भारत
  • .net – नेटवर्क
  • .name – पर्सनल
  • .jobs – नोकरी
  • .biz – बिजनेस आर्गेनाईजेशन
  • .edu – शैक्षिक संस्था
  • .org – आर्गेनाईजेशन
  • .mil – सैनिक
  • .asia – एशिया
  • .com – कॉमर्शियल

कम्प्यूटर की भाषायें (Computer languages) क्या है ?

मनुष्य को एक-दूसरे से बातचीत करने के लिए भाषा (Language) की आवश्यकता होती है । भाषा संचार (communications) का एक साधन है । ठीक उसी तरह, कम्प्यूटर से बातचीत करने के लिए हमें कम्प्यूटर की भाषाओं की जानकारी होनी चाहिए । कम्प्यूटर भाषायें अनेक प्रकार (Types) की होती है जिनके अपने ही संकेत और प्रयोग करने के नियम होते हैं जो की इंसान को कम्प्यूटर से बातचीत करने में सहायता करते हैं।

तार्किक रूप से सम्बन्धित निर्देशों का समूह जिसे क्रमानुसार व्यवस्थित (Orederly arranged) किया होता है ताकि वह कम्प्यूटर को समस्या सुलझाने में मार्गदर्शन करे, प्रोग्राम कहलाता है । वे भाषायें जिनमें प्रोग्राम लिखे जाते हैं, प्रोग्रामिंग (programming) कहलाती हैं । सही नतीजे पाने के लिए इसे सही ढंग से प्रोग्राम किया जाना आवश्यक है।

इन प्रोग्रामिंग भाषाओं को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है :

  • मशीनी भाषा (Machine Language)
  • असेम्बली भाषा (Assembly Language)
  • उच्च-स्तरीय भाषा (High Level Language)

कम्प्यूटर वायरस (Computer virus) क्या है ?

वायरस एक प्रोग्राम है जो हमारे कम्प्यूटर सिस्टम (System) में बिना हमारी इच्छा तथा जानकारी के लोड (Load) हो जाता है । एक वायरस बार-बार खुद की प्रतिलिपि (Copy) तैयार कर सकता है और उपलब्ध सारे मेमोरी (Memory) का उपयोग कर सिस्टम की गति को धीरे या पूर्णतः रोक सकता है । कुछ वायरस कम्प्यूटर के बूटिंग (Booting) से स्वंय को जोड़ लेता है तथा जितनी बार कम्प्यूटर बूट (Boot) करता है वह उतना ही फैलता जाता है या कम्प्यूटर को रिबूट (Reboot) करता रहता है । वह कम्प्यूटर के डेटा या प्रोग्राम को क्षति (Damages) पहुँचाता है । हमारे कम्प्यूटर में वायरस के आने का सामान्य तरीका इंटरनेट तथा अवांछित ई-मेल (Unwanted e-mail) है ।

कम्प्यूटर वायरस भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं (Types of computer virus) :

  • मल्टीपार्टाइट वायरस ( Multipartite Virus)
  • लिंक वायरस (Link Virus)
  • मैक्रो वायरस (Macro Virus)
  • बूट सेक्टर वायरस (Boot Sector Virus)
  • परजीवी वायरस (Parasitic Virus)

वायरस को नष्ट करने के लिए बनाये गये प्रोग्राम या सॉफ्टवेयर को एन्टीवायरस (Antivirus) कहते हैं । इसमें आटो प्रोटेक्ट (Auto protect) तथा रियाल टाइम प्रोटेक्सन की सुविधा रहती है जो इंटरनेट से किसी फाइल का उपयोग करने के पहले उसे जाँच (Check) लेता है कि यह वायरस मुक्त है या नहीं । अगर फिर भी वायरस सिस्टम में सक्रिय (Active) हो जाता है, तो हमें सूचित (Inform) कर देता है । जिसे हम एन्टीवायरस के सिस्टम स्कैन (Scan) चलाकर हटा सकते हैं । कुछ समय के अंतराल (Interval) पर पूर्ण सिस्टम स्कैन चलाकर हम कम्प्यूटर को वायरस मुक्त रखने में सक्षम हो सकते हैं । सर्वप्रथम दिखनेवाला पर्सनल कम्प्यूटर वायरस सी-ब्रेन ( C-brain) है ।

कुछ कम्प्यूटर वाइरस निम्नलिखित है :

  • सी-ब्रेन (C-Brain)
  • मंकी (Monkey)
  • वान हॉफ (Vanhalf)
  • माइकल एंगेलो (Michelangelo)
  • क्रिपर (Creeper)
  • हैप्पी वर्थडे जोशी (Happy Birthday Joshi)

लैंग्वेज प्रोसेसर्स (Language processors) क्या है ?

कम्प्यूटर केवल मशीनी भाषा (Machine Language) समझता है जो कि दो अंकों (0 और 1) पर आधारित होती है लेकिन प्रोग्रामर मशीनी भाषा में प्रोग्राम लिखने में असमर्थ (unable) होता है । स्त्रोत भाषा में लिखे ये प्रोग्राम कम्प्यूटर के लिए मशीनी भाषा में परिवर्तित किये जाते हैं । ये भाषा प्रोसेसर (Language Processor)उच्च-स्तरीय भाषा को मशीनी भाषा में और मशीनी भाषा को उच्च-स्तरीय भाषा में अनुवाद (Translate) करते हैं । मशीन भाषा की तुलना में उच्च-स्तरीय भाषा में प्रोग्राम लिखना सरल होता है ।

तीन प्रकार के भाषा प्रोसेसर (Language Processors) हैं :

  • अनुवादक (Assembler) :

वह प्रोग्राम जो कि असेम्बली भाषा के प्रोग्रामों का अनुवाद मशीनी भाषा में करता है, अनुवादक कहलाता है ।

  • इन्टरप्रेटर (Interpreter) :

वह प्रोग्राम जो उच्च-स्तरीय भाषा (High level language) में लिखे प्रोग्राम (Program) का अनुवाद मशीनी भाषा (Machine language) में करता है, इन्टरप्रेटर (Interpreter) कहलाता है । यह एक के बाद एक लाइन का अनुवाद करता है इसलिए प्रत्येक वाक्य में होने वाली त्रुटियों को मॉनीटर (Monitor) पर एक के बाद एक करके दिखता है । यहाँ पर त्रुटियों को ढूँढना और उन्हें दूर करना बहुत आसान होता है । कई बार तो हम गलती का तभी पता लगा लेते हैं जब हम कम्प्यूटर पर निर्देश टाइप करते हैं ।

  • कम्पाइलर (Compiler) :

यह उच्च-स्तरीय भाषा (High level language) को मशीनी भाषा (Machine language) में परिवर्तित (Convert) करता है । जब प्रोग्राम पूर्ण रूप से कम्प्यूटर में डाल दिया जाता है तब यह पूरे प्रोग्राम को एक ही बार में अनुवाद (Translation) कर देता है । इससे शीघ्रता से पूरा प्रोग्राम मशीनी भाषा में अनुवादित हो जाता है और यदि इसमें कुछ त्रुटियाँ हैं, वे एक ही समय में स्क्रीन पर प्रकट हो जाती हैं । जब सभी त्रुटियाँ दूर कर दी जाती हैं तो उस प्रोग्राम को फिर से अनुवादित किया जाता है ।

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